2014 में कांग्रेस की करारी हार के बाद जब पार्टी ने आत्ममंथन किया, तो पूर्व रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी की रिपोर्ट ने एक अहम चेतावनी दी थी — कांग्रेस की छवि जनता के बीच “मुस्लिम परस्त” पार्टी की बन गई है।
एंटनी ने कहा था कि कांग्रेस को इस छवि से बाहर निकलना होगा, वरना जनता का भरोसा लगातार कम होता जाएगा। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि पार्टी ने उस रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया है।

अब कांग्रेस शासित तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के हालिया बयान ने इस बहस को फिर जिंदा कर दिया है।
रेड्डी ने मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहा —

“कांग्रेस मुस्लिम है और मुस्लिम ही कांग्रेस।”

यह बयान केवल तेलंगाना की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक संकेत बिहार के सीमांचल तक देखे जा रहे हैं — जहां मुस्लिम वोट बैंक अब भी निर्णायक भूमिका में है।


सीमांचल: कांग्रेस की आखिरी उम्मीद

बिहार के अररिया, कटिहार, किशनगंज और पुर्णिया जिलों को मिलाकर सीमांचल कहा जाता है। यहां मुस्लिम आबादी 35% से 70% तक है।
यह इलाका कभी कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है, लेकिन 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव और आरजेडी के उभार के बाद कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया।
फिर भी, पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति पुरानी सहानुभूति दोबारा उभरती दिखी है।

2020 के चुनाव में कांग्रेस सीमांचल की कुछ सीटों पर ही सिमट गई, जबकि आरजेडी और एआईएमआईएम (AIMIM) ने यहां सेंध लगा दी।
यही वजह है कि रेवंत रेड्डी का बयान कांग्रेस के लिए सीमांचल में संदेशात्मक हथियार बन सकता है — कि पार्टी आज भी मुसलमानों की सबसे बड़ी राजनीतिक गारंटी है।


एआईएमआईएम से सबसे बड़ी चुनौती

कांग्रेस की सीमांचल में असली टक्कर भाजपा या जेडीयू से नहीं, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम से है।
2020 में ओवैसी की पार्टी ने 5 सीटें जीतकर कांग्रेस और आरजेडी दोनों को झटका दिया था।
एआईएमआईएम ने खुद को मुसलमानों की “असली आवाज़” बताकर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई थी।

रेवंत रेड्डी का बयान इस नैरेटिव को काउंटर करता दिख रहा है —

“अगर कांग्रेस खुद को मुस्लिमों की पार्टी घोषित करती है, तो ओवैसी का दावा कमजोर पड़ता है।”

हालांकि सवाल यह भी है कि अगर ऐसा बयान योगी आदित्यनाथ या ओवैसी देते, तो शायद राजनीतिक तूफान खड़ा हो जाता।
लेकिन रेवंत रेड्डी के बयान पर कांग्रेस खामोश है, शायद इसलिए क्योंकि यह बयान रणनीतिक मकसद से दिया गया है।


🧭 कांग्रेस की सीमांचल रणनीति

बिहार में इस बार सीमांचल की 24 सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधी टक्कर है।

  • कांग्रेस: 12 सीटें
  • आरजेडी: 9 सीटें
  • वीआईपी: 2 सीटें
  • सीपीआई(एमएल): 1 सीट

दूसरी ओर, एआईएमआईएम 15 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि
बीजेपी 11, जेडीयू 10 और एलजेपी (आर) 3 सीटों पर मैदान में है।

2020 में सीमांचल की 24 सीटों में से:

  • एनडीए को 12 सीटें (8 बीजेपी + 4 जेडीयू)
  • महागठबंधन को 7 सीटें
  • एआईएमआईएम को 5 सीटें मिली थीं।

बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार:

  • किशनगंज में मुस्लिम आबादी 67%
  • कटिहार में 42%,
  • अररिया में 41%,
  • पुर्णिया में 37% है।

यानी, कांग्रेस के लिए सीमांचल अस्तित्व की लड़ाई है — अगर यहां पार्टी मजबूत रहती है, तो उसका बिहार में वजूद बचा रहेगा।