Haq Movie Review in Hindi: समाज और संविधान के बीच ‘हक’ की गूंज

साल 1947 में आज़ादी के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने देश से वादा किया था — यहां हर नागरिक को समान अधिकार मिलेगा और कोई भेदभाव नहीं होगा। लेकिन क्या हम समाज के तौर पर उस वादे को निभा पाए हैं? इसी सवाल का जवाब तलाशती है सुपर्ण वर्मा निर्देशित फिल्म ‘हक’, जिसमें इमरान हाशमी, यामी गौतम और वर्तिका सिंह ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं।

‘हक’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सोचने पर मजबूर करने वाली कहानी है, जो धर्म, मजहब और संविधान के बीच इंसानियत की असली परिभाषा को सामने लाती है।


कहानी की शुरुआत: प्यार, शादी और एक झूठ का खुलासा

फिल्म की कहानी साल 1967 से शुरू होती है। शाजिया बानो (यामी गौतम) और अब्बास (इमरान हाशमी) की मोहब्बत एक खूबसूरत शादी में बदलती है। लेकिन धीरे-धीरे उनके रिश्ते में दरारें आने लगती हैं। कहानी मोड़ लेती है जब सायरा (वर्तिका सिंह) की एंट्री होती है — अब्बास ने शाजिया को बिना बताए सायरा से दूसरी शादी कर ली है।

इसके बाद शुरू होती है शाजिया की अपने ‘हक’ की लड़ाई, जो मजहब और संविधान के बीच एक तीखी बहस बन जाती है। सवाल उठता है — क्या धर्म की आड़ में इंसान का अधिकार छीना जा सकता है?


निर्देशन और संदेश: सुपर्ण वर्मा का संतुलित नज़रिया

निर्देशक सुपर्ण वर्मा ने फिल्म को एकतरफा नहीं बनने दिया है। उन्होंने बड़े सलीके से यह दिखाया है कि किसी भी धर्म की पवित्र किताब संविधान के खिलाफ नहीं है, बल्कि दोनों इंसाफ और बराबरी की ही बात करते हैं।

फिल्म की कहानी शाह बानो केस (1985) से प्रेरित है, जिसने भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों की दिशा बदल दी थी। सुपर्ण वर्मा ने इस विषय को आधुनिक संदर्भ में बड़ी ईमानदारी से पेश किया है।


अभिनय: इमरान, यामी और वर्तिका ने किया दिल जीतने वाला काम

इमरान हाशमी और यामी गौतम ने अपने करियर के सबसे परिपक्व किरदार निभाए हैं। इमरान ने अब्बास के रूप में एक जटिल इंसान को दिखाया है, जबकि यामी ने शाजिया के संघर्ष और आत्मसम्मान को प्रभावशाली तरीके से जीवंत किया है।

वर्तिका सिंह, जो इस फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू कर रही हैं, ने सायरा के किरदार में गहराई और संवेदना भरी है। उनके अभिनय से साफ है कि वह इंडस्ट्री में लंबी रेस की खिलाड़ी हैं।

शीबा चड्ढा, दानिश हुसैन और राहुल मित्रा ने भी अपने किरदारों में जान डाल दी है, खासकर शीबा का किरदार शाजिया की ताकत बनकर उभरता है।


डायलॉग्स और स्क्रीनप्ले: हर शब्द में है ताकत

फिल्म के डायलॉग्स इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। चाहे इमरान और यामी के बीच के इमोशनल सीन हों या कोर्टरूम ड्रामा — हर संवाद सोचने पर मजबूर करता है। “हक” का लेखन गहराई लिए हुए है और इसमें सामाजिक संदेश के साथ मनोरंजन का भी पूरा ध्यान रखा गया है।


फाइनल वर्डिक्ट: परिवार के साथ देखने लायक फिल्म

‘हक’ सिर्फ मुस्लिम महिलाओं की कहानी नहीं है, बल्कि हर भारतीय महिला और पुरुष की जिम्मेदारी की कहानी है। यह फिल्म सिखाती है कि धर्म और समाज से ऊपर इंसानियत और समानता है।